(1)
जैसे अर्थशास्त्र जानते हो उसी भांति यदि
राजनीति शास्त्र के भी जानकार होते तुम ।
राज़दार जैसे बने राजा और राडिया के
काश जन-मन के भी जानकार होते तुम ।
भ्रष्ट सहयोगियों के बन के कवच यदि
आज यूं बुढ़ापे में न दागदार होते तुम ।
पीएम के पद को कलंकित न करते
तो सरदार कितने असरदार होते तुम ।
(2)
पीएम बने थे छवि लेकर ईमानदार
वही छवि रहते तो शानदार होते तुम ।
नीली पगड़ी पे रंग-सोनिया न चढ़ता
तो सच कहता हूं बड़े रंगदार होते तुम ।
लुटता नहीं ये देश हसनअली के हाथों
जिम्मेदारियों से जो खबरदार होते तुम ।
कोर्ट से जो बार-बार मिलती न फटकार
सरदार कितने असरदार होते तुम ।
(3)
छपता था नोट-नोट पर नाम धुआंधार
वही छवि लिए हुए सरदार होते तुम ।
चक्कर में पड़ते न आज जो फटीचरों के
होकर रिटायर भी दमदार होते तुम ।
अच्छे-खासे आदमी को चमचों ने चूस लिया
वरना तो मर्जी के सरकार होते तुम ।
कलमाडियों के साथ खेल नहीं खेलते
तो सरदार कितने असरदार होते तुम ।
(4)
चाचा नेहरू सरीखी दूरदृष्टि रखते तो
आज नहीं सह रहे दुत्कार होते तुम ।
लालबहादुर जैसे लाल होते देश के तो
जनता के प्यार के भी हकदार होते तुम ।
गुरु तेग वाली तेग याद कर लेते यदि
दुर्गा सी इंदिरा के अवतार होते तुम ।
काश ! आप एक भी चुनाव जीत सकते
तो सरदार कितने असरदार होते तुम ।
- ओमप्रकाश तिवारी
Saturday, March 26, 2011
होली के चार छंद
(1)
लागी अबीर गुलाल जो लाल तो भाल कै श्री कछु औरहिं जागी ।
जागी जो अ र र कबीर की बानी गुमानहिं मान सबै जन त्यागी ।
त्यागि के आज मलाल-कुचाल निहाल भए रस प्रेमहिं पागी ।
पागी सनेह-सुधा संग मीतहिं बैरिहुं सों बढ़ि अंकहिं लागी ।
(2)
रंग कुरंग भयो गुंझिया के जो दूध व खोया ने दै दियो गोली ।
तेल व आलू के झापड़ खाइ के पापड़ की भई सूरत भोली ।
हाल बेहाल है काले में दाल है यार हलाल किये घटतोली ।
कोढ़ में खाज बनी है चिढ़ावति सौतन सों चली आवति होली ।
(3)
भायन मा हौं बड़ा सबसे मोरी भावज है न कोऊ मुंहबोली ।
साली जो मांगत रंग खेलाई कै है महंगा लहंगा अरु चोली ।
रंग के नाम करैं घरवालिहुं जी खिसियाय के टाल मटोली ।
यार रंगे हैं सियार की भांति मैं खेलूं भला केहिके संग होली ।
(4)
यार मिलें दिलदार तो खेलना भाता है रंग-गुलाल की होली ।
गोरी मिले ब्रज ग्वालिन जैसी तो खेलिए लट्ठ व ढाल की होली ।
भंग का रंग जमे तो जमाइये बाद में मीठे के थाल की होली ।
फीका है फागुन सारा का सारा जो खेली नहीं ससुराल की होली ।
- ओमप्रकाश तिवारी
लागी अबीर गुलाल जो लाल तो भाल कै श्री कछु औरहिं जागी ।
जागी जो अ र र कबीर की बानी गुमानहिं मान सबै जन त्यागी ।
त्यागि के आज मलाल-कुचाल निहाल भए रस प्रेमहिं पागी ।
पागी सनेह-सुधा संग मीतहिं बैरिहुं सों बढ़ि अंकहिं लागी ।
(2)
रंग कुरंग भयो गुंझिया के जो दूध व खोया ने दै दियो गोली ।
तेल व आलू के झापड़ खाइ के पापड़ की भई सूरत भोली ।
हाल बेहाल है काले में दाल है यार हलाल किये घटतोली ।
कोढ़ में खाज बनी है चिढ़ावति सौतन सों चली आवति होली ।
(3)
भायन मा हौं बड़ा सबसे मोरी भावज है न कोऊ मुंहबोली ।
साली जो मांगत रंग खेलाई कै है महंगा लहंगा अरु चोली ।
रंग के नाम करैं घरवालिहुं जी खिसियाय के टाल मटोली ।
यार रंगे हैं सियार की भांति मैं खेलूं भला केहिके संग होली ।
(4)
यार मिलें दिलदार तो खेलना भाता है रंग-गुलाल की होली ।
गोरी मिले ब्रज ग्वालिन जैसी तो खेलिए लट्ठ व ढाल की होली ।
भंग का रंग जमे तो जमाइये बाद में मीठे के थाल की होली ।
फीका है फागुन सारा का सारा जो खेली नहीं ससुराल की होली ।
- ओमप्रकाश तिवारी
Thursday, August 19, 2010
मुफ्त अनाज
जब तक शीश पवार के है मंत्री का ताज,
नहीं मिलेगा आपको बिल्कुल मुफ्त अनाज ।
बिल्कुल मुफ्त अनाज भले ही सड़ता जाए,
दारू बनकर शीश आपके चढ़ता जाए ।
यूपीए का स्वप्न भला पूरा होगा कब,
लिए कटोरा दिखलाई देंगे दरिद्र जब ।
नहीं मिलेगा आपको बिल्कुल मुफ्त अनाज ।
बिल्कुल मुफ्त अनाज भले ही सड़ता जाए,
दारू बनकर शीश आपके चढ़ता जाए ।
यूपीए का स्वप्न भला पूरा होगा कब,
लिए कटोरा दिखलाई देंगे दरिद्र जब ।
Friday, June 11, 2010
अर्जुन सिंह
अर्जुन सिंह के नाम पर गरम हुआ भोपाल ।
राजा साहब बन गए फीफा के फुटबाल ।।
- ओमप्रकाश तिवारी
राजा साहब बन गए फीफा के फुटबाल ।।
- ओमप्रकाश तिवारी
Saturday, November 21, 2009
ताज नहीं, सारी दुनिया का दिल दहलाने आए थे
ताज नहीं, सारी दुनिया का
दिल दहलाने आए थे,
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
लोग चले थे गांव-देश की
माटी की सुधि लाने को,
किसे पता था वो निकले हैं
मिट्टी में मिल जाने को ।
इंतजार था अपने घर की
गाड़ी में चढ़ जाने का,
तड़-तड़-तड़-तड़ मौत आ गई
यम के घर ले जाने को ।
बेकसूर-निर्दोषों पर वे
कहर ढहाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
ए.के.47 जब गरजी
हर मजहब का खून बहा,
किसी के मुंह से निकला अल्ला
और किसी ने राम कहा ।
वीटी,ताज,नरीमन हाउस
एक रंग में नहा उठे,
लहू बहा सबका धरती पर
कहीं न कोई भेद रहा ।
सच पूछो तो भारत मां का
खून बहाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
खून बहे मां का तो
बेटा कैसे देखे खड़े-खड़े,
झिल्लू यादव छीन राइफल
शैतानों से जूझ पड़े ।
उनकी हिम्मत देख साथियों
की भी जब हिम्मत जागी,
भाड़े के टट्टू तुरंत ही
हुए वहां से भाग खड़े ।
ज़िंदादिल जुनून से कुछ
कायर टकराने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
लड़ा सामने से वह जब-जब
उसको मिली करारी हार,
इसीलिए करता है अब वह
छुप करके पीछे से वार ।
दहशतगर्दी के आलम में
डरे-डरे से हम बैठे,
बिना नियम का युद्ध हो रहा,
बच्चों-बूढ़ों का संहार ।
बुरा न मानो बेहोशी से
हमें जगाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
सागर की सरहद पर बैठा
गद्दारों का डेरा है ,
चप्पे-चप्पे को आतंकी
एजेंटों ने घेरा है ।
वरना कैसे यहूदियों के
घर का पता उन्हें चलता,
जाहिर है दुश्मन के घर में
बैठा कोई मेरा है ।
तभी तो सागर के रस्ते से
सेंध लगाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
जोर-जोर से शोर मचाया
हिंदू दहशतगर्दी का,
चालाकी से ध्यान बंटाया
उसने खाकी वर्दी का ।
प्रज्ञा, पांडे और पुरोहित
के तारों में उलझी थी,
हुई शिकार स्वयं एटीएस
जेहादी बेदर्दी का ।
बुनकर जाल हमारे घर में
हमें फंसाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
दहशतगर्दी के कारण ही
हम आपस में मरते हैं ।
हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे
पर टिप्पणियां करते हैं ।
संग समय के घाव पुराना
जब-जब भरने लगता है,
ये दहशतपसंद आ करके
नया घाव फिर करते हैं ।
दो कौमों के बीच फासला
और बढ़ाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
साठ बरस की आजादी पर
भारी थे वे घंटे साठ,
सच्चे भारतवासी हो तो
मन में बांधो अपने गांठ ।
सफल न होने देंगे साजिश
भारत में गद्दारों की,
कसम शहीदों की है तुमको
इस घटना से सीखो पाठ ।
मिटा के रखेंगे उनको
जो हमें मिटाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
( एक रिपोर्टर के रूप में 26 नवंबर , 2008 के आतंकी हमले की लगभग सभी घटनाओं को प्रत्यक्ष देखने और अनुभव करने के बाद यह कविता मैंने लिखी थी । इसका प्रथम पाठ फैजाबाद की नाका मुज़फरा स्थित हनुमान गढ़ी के कवि सम्मेलन में 16 दिसंबर,2008 को किया गया था )
दिल दहलाने आए थे,
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
लोग चले थे गांव-देश की
माटी की सुधि लाने को,
किसे पता था वो निकले हैं
मिट्टी में मिल जाने को ।
इंतजार था अपने घर की
गाड़ी में चढ़ जाने का,
तड़-तड़-तड़-तड़ मौत आ गई
यम के घर ले जाने को ।
बेकसूर-निर्दोषों पर वे
कहर ढहाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
ए.के.47 जब गरजी
हर मजहब का खून बहा,
किसी के मुंह से निकला अल्ला
और किसी ने राम कहा ।
वीटी,ताज,नरीमन हाउस
एक रंग में नहा उठे,
लहू बहा सबका धरती पर
कहीं न कोई भेद रहा ।
सच पूछो तो भारत मां का
खून बहाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
खून बहे मां का तो
बेटा कैसे देखे खड़े-खड़े,
झिल्लू यादव छीन राइफल
शैतानों से जूझ पड़े ।
उनकी हिम्मत देख साथियों
की भी जब हिम्मत जागी,
भाड़े के टट्टू तुरंत ही
हुए वहां से भाग खड़े ।
ज़िंदादिल जुनून से कुछ
कायर टकराने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
लड़ा सामने से वह जब-जब
उसको मिली करारी हार,
इसीलिए करता है अब वह
छुप करके पीछे से वार ।
दहशतगर्दी के आलम में
डरे-डरे से हम बैठे,
बिना नियम का युद्ध हो रहा,
बच्चों-बूढ़ों का संहार ।
बुरा न मानो बेहोशी से
हमें जगाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
सागर की सरहद पर बैठा
गद्दारों का डेरा है ,
चप्पे-चप्पे को आतंकी
एजेंटों ने घेरा है ।
वरना कैसे यहूदियों के
घर का पता उन्हें चलता,
जाहिर है दुश्मन के घर में
बैठा कोई मेरा है ।
तभी तो सागर के रस्ते से
सेंध लगाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
जोर-जोर से शोर मचाया
हिंदू दहशतगर्दी का,
चालाकी से ध्यान बंटाया
उसने खाकी वर्दी का ।
प्रज्ञा, पांडे और पुरोहित
के तारों में उलझी थी,
हुई शिकार स्वयं एटीएस
जेहादी बेदर्दी का ।
बुनकर जाल हमारे घर में
हमें फंसाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
दहशतगर्दी के कारण ही
हम आपस में मरते हैं ।
हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे
पर टिप्पणियां करते हैं ।
संग समय के घाव पुराना
जब-जब भरने लगता है,
ये दहशतपसंद आ करके
नया घाव फिर करते हैं ।
दो कौमों के बीच फासला
और बढ़ाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
साठ बरस की आजादी पर
भारी थे वे घंटे साठ,
सच्चे भारतवासी हो तो
मन में बांधो अपने गांठ ।
सफल न होने देंगे साजिश
भारत में गद्दारों की,
कसम शहीदों की है तुमको
इस घटना से सीखो पाठ ।
मिटा के रखेंगे उनको
जो हमें मिटाने आए थे ।
पाकिस्तानी फिर से अपनी
जात दिखाने आए थे ।
( एक रिपोर्टर के रूप में 26 नवंबर , 2008 के आतंकी हमले की लगभग सभी घटनाओं को प्रत्यक्ष देखने और अनुभव करने के बाद यह कविता मैंने लिखी थी । इसका प्रथम पाठ फैजाबाद की नाका मुज़फरा स्थित हनुमान गढ़ी के कवि सम्मेलन में 16 दिसंबर,2008 को किया गया था )
Friday, October 23, 2009
घर का भेदी
लंका ढाने के लिए भेदी है बदनाम,
भला विभीषण क्या करे जब कर्ता श्रीराम ।
जब कर्ता श्रीराम फार्मुला है यह देसी,
अक्सर जिसको अपना लेते हैं कांग्रेसी ।
महाराष्ट्र में बजवाया फिर अपना डंका,
राज ठाकरे से ढहवा चाचा की लंका ।
भला विभीषण क्या करे जब कर्ता श्रीराम ।
जब कर्ता श्रीराम फार्मुला है यह देसी,
अक्सर जिसको अपना लेते हैं कांग्रेसी ।
महाराष्ट्र में बजवाया फिर अपना डंका,
राज ठाकरे से ढहवा चाचा की लंका ।
Friday, May 29, 2009
कला चिपकने की
देखो फिर से चल पड़ी मनमोहन सरकार,
कुछ अपने एमपी मिले कुछ ले लिये उधार ।
कुछ ले लिए उधार मिल रही खूब बधाई,
मनमोहन के चेहरे पर छाई तरुणाई ।
कला चिपकने की मनमोहन जी से सीखो,
वरना बन अडवाणी अपना रस्ता देखो ।
- ओमप्रकाश तिवारी
कुछ अपने एमपी मिले कुछ ले लिये उधार ।
कुछ ले लिए उधार मिल रही खूब बधाई,
मनमोहन के चेहरे पर छाई तरुणाई ।
कला चिपकने की मनमोहन जी से सीखो,
वरना बन अडवाणी अपना रस्ता देखो ।
- ओमप्रकाश तिवारी
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